Zameen Ka Batwara Kaise Kare: पटना में पुश्तैनी ज़मीन और वंशावली
सीधा जवाब: पटना और बिहार में पुश्तैनी ज़मीन का बँटवारा तीन कदम में पूरा होता है: (1) वंशावली बनाइए, जिसमें सभी वारिस हों, बेटियाँ भी; (2) बँटवारा कागज़ पर लाइए: सबसे सुरक्षित रजिस्टर्ड बँटवारा-पत्र है, और विरासत में मिली/पारिवारिक संपत्ति के बँटवारे पर बिहार में सिर्फ़ ₹50 स्टांप + ₹50 निबंधन शुल्क लगता है; (3) दाखिल-खारिज कराइए, ताकि हर हिस्सेदार के नाम अलग जमाबंदी बने। दाखिल-खारिज मुफ़्त है और बँटवारे के 90 दिन के भीतर आवेदन करना होता है। जब तक जमाबंदी दादा-परदादा के नाम पर है, तब तक कागज़ में ज़मीन किसी एक की नहीं, पूरे परिवार की है।
एक उदाहरण: मान लीजिए नौबतपुर अंचल के किसी गाँव में 12 कट्ठा ज़मीन की जमाबंदी आज भी दादाजी के नाम पर है। पिताजी गुज़र चुके हैं। दो भाई पटना में रहते हैं और एक बहन की शादी हो चुकी है। बड़े भाई अपना हिस्सा बेचना चाहते हैं, पर ख़रीदार पूछता है: "बँटवारा कहाँ है? बहन की सहमति कहाँ है?" पटना के आसपास की बहुत-सी ज़मीन इसी हाल में है। नीचे का तरीका इसी हालत के लिए है।
पटना में पुश्तैनी ज़मीन का बँटवारा: पूरा तरीका एक नज़र में
| कदम | क्या करना है | कागज़ / जगह |
|---|---|---|
| 1 | रिकॉर्ड देखें: ज़मीन किसके नाम है, कितना रकबा है, कितने खेसरे हैं | बिहार भूमि पर जमाबंदी पंजी, खतियान (खतियान कैसे निकालें) |
| 2 | वंशावली बनाएँ: जमाबंदी/खतियान वाले रैयत से आज के हर जीवित वारिस तक | गाँव में सरपंच; शहरी क्षेत्र के लिए अंचल कार्यालय से पूछें (नीचे देखें) |
| 3 | मृत्यु प्रमाण पत्र जुटाएँ: जिन पूर्वजों के नाम ज़मीन है | पंचायत / नगर निकाय |
| 4 | हिस्से तय करें और ज़मीन पर कौन-सा टुकड़ा किसका, यह खेसरा और चौहद्दी के साथ लिखें | ज़रूरत हो तो अमीन से नापी (बिहार भूमि पर "ई-मापी") |
| 5 | बँटवारा-पत्र रजिस्टर्ड कराएँ, सभी हिस्सेदारों के दस्तख़त के साथ | अवर निबंधन कार्यालय; पारिवारिक संपत्ति पर ₹50 + ₹50 |
| 6 | दाखिल-खारिज (बँटवारा नामांतरण) का ऑनलाइन आवेदन, 90 दिन के भीतर | बिहार भूमि पोर्टल; कोई सरकारी फ़ीस नहीं |
| 7 | नई जमाबंदी जाँचें, लगान रसीद अपने नाम कटवाएँ, SMS अलर्ट चालू करें | बिहार भूमि |
वंशावली क्या है और बिहार में कैसे बनती है?
वंशावली (कुर्सीनामा) परिवार का वह पेड़ है, जो दिखाता है कि रिकॉर्ड में दर्ज रैयत से आज के वारिसों तक ज़मीन कैसे पहुँची: किसके कितने बेटे-बेटियाँ थे, कौन गुज़र गया, और गुज़रे हुए वारिस के बच्चे कौन हैं। बँटवारा, उत्तराधिकार वाला दाखिल-खारिज और विशेष सर्वे, तीनों में यही सबसे पहला कागज़ है।
- दाखिल-खारिज के लिए: राजस्व विभाग के FAQ के अनुसार विरासत (बिना वसीयत) वाले दाखिल-खारिज में मृत्यु प्रमाण पत्र और वंशावली लगती है।
- विशेष सर्वे के लिए: रैयत को अपनी वंशावली प्रपत्र 3(1) में (नगर निकाय क्षेत्र में जून 2026 के नियम संशोधन से प्रपत्र 3(1)(A)) भरकर जमा करनी होती है। विभाग के सर्वे FAQ (प्रश्न 46) के अनुसार इसका सत्यापन गाँव की ग्राम सभा, पंचायत सेवक या चौकीदार/दफ़ादार से कराया जाता है। अगर वारिस अब गाँव में नहीं रहते (जैसे पूरा परिवार पटना शहर या बाहर बस गया), तब भी वंशावली उसी राजस्व गाँव में जाकर बनेगी, और मुखिया, पंचायत समिति सदस्य, वार्ड सदस्य, सरपंच या चौकीदार से मदद ली जाएगी (प्रश्न 12)।
- वंशावली कौन जारी करता है? गाँवों में यह सरपंच से बनती है। दिसंबर 2025 की ख़बरों के अनुसार राजस्व विभाग ने नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत क्षेत्रों में अंचलाधिकारी (CO) को वंशावली जारी करने के लिए सक्षम किया है। इसकी अधिसूचना हमें विभाग की वेबसाइट पर नहीं मिली, इसलिए पटना शहर की ज़मीन के लिए अपने अंचल कार्यालय से पूछकर ही आवेदन करें। (पटना के सभी अंचल कार्यालय और CO के नंबर)
वंशावली में सबसे आम गलती: शादीशुदा बेटियों, गुज़र चुके भाई के बच्चों या दूसरी शादी से हुई संतान का नाम छोड़ देना। बाद में इन्हीं में से कोई दाखिल-खारिज पर आपत्ति कर देता है, और पूरा बँटवारा अटक जाता है। नाम, पिता/पति का नाम और रिश्ता वैसे ही लिखें जैसे सरकारी रिकॉर्ड में है।
पुश्तैनी ज़मीन में किसका कितना हक़ है? बेटियों का भी
हिंदू परिवारों में हिस्सा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 से तय होता है। दो बातें सबसे ज़रूरी हैं:
- पुश्तैनी (संयुक्त परिवार की) संपत्ति में बेटी का हक़ बेटे जितना: 2005 के संशोधन के बाद धारा 6 के अनुसार बेटी जन्म से ही "सहदायिक" (coparcener) है, और उसके हक़ और ज़िम्मेदारियाँ बेटे जैसी ही हैं। धारा 6 में शादी की कोई शर्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (11 अगस्त 2020) में साफ़ किया कि यह हक़ बेटी को मिलेगा चाहे वह 2005 से पहले जन्मी हो या बाद में, और इसके लिए 9.9.2005 को पिता का जीवित होना ज़रूरी नहीं। 20 दिसंबर 2004 से पहले हो चुका बँटवारा या बिक्री इससे नहीं खुलती।
- बिना वसीयत गुज़रे व्यक्ति की अपनी संपत्ति: यह "Class I" वारिसों को मिलती है, जिनमें बेटा, बेटी, विधवा (पत्नी) और माँ शामिल हैं, और बेटी, बेटे और विधवा के साथ एक ही समय पर हक़दार होती है (पहले बेटे, फिर बेटी जैसा कोई क्रम नहीं)। राजस्व विभाग के सर्वे FAQ (प्रश्न 65) में उदाहरण है: कोई हिंदू एक बेटा, एक बेटी, माँ और पिता छोड़कर गुज़रे, तो खाता बेटा, बेटी और माँ के नाम 1/3-1/3 खुलेगा; पिता को हिस्सा नहीं, क्योंकि वे Class I में नहीं आते।
ज़मीन पुश्तैनी है या किसी की अपनी कमाई हुई, कौन कब गुज़रा, कोई वसीयत है या नहीं: हर परिवार में ये बातें अलग होती हैं और हिस्सा इन्हीं से बदलता है। मुस्लिम और ईसाई परिवारों पर अलग क़ानून लागू होता है। इसलिए हिस्से का हिसाब कागज़ पर उतारने से पहले किसी वकील से अपना मामला दिखा लें। अगर कोई बहन या भाई अपना हिस्सा नहीं लेना चाहता, तो उसे सिर्फ़ ज़ुबानी नहीं, रजिस्टर्ड हक़त्याग-पत्र से छोड़ना होता है (ख़र्च नीचे देखें)।
बँटवारा कितने तरीके से होता है, और दाखिल-खारिज में कौन-सा माना जाता है?
राजस्व विभाग के दाखिल-खारिज FAQ (प्रश्न 4) के अनुसार "होल्डिंग का बँटवारा" होने पर इनमें से किसी एक कागज़ की कॉपी से दाखिल-खारिज हो सकता है:
| बँटवारे का तरीका | दाखिल-खारिज में क्या लगेगा | हमारी राय |
|---|---|---|
| रजिस्टर्ड बँटवारा-पत्र | निबंधित बँटवारा दस्तावेज़ की कॉपी | सबसे सुरक्षित; पारिवारिक संपत्ति पर ख़र्च सिर्फ़ ₹100 |
| आपसी बँटवारा (बिना रजिस्ट्री) | सभी हिस्सेदारों के दस्तख़त वाला बँटवारा-पत्र + सभी की लिखित सहमति | चल जाता है, पर बाद में कोई मुकर जाए तो कमज़ोर पड़ता है |
| पंचायती बँटवारा | पंचायती बँटवारे की कॉपी + सभी हिस्सेदारों की लिखित सहमति | वही जोखिम; सहमति हो तो इसे भी रजिस्टर्ड करा लें |
| कोर्ट का बँटवारा | सक्षम न्यायालय के बँटवारा आदेश की कॉपी | जब सहमति न बने |
ज़ुबानी बँटवारा क्यों काफ़ी नहीं: पटना के गाँवों में अक्सर "खेत तो बाबूजी के समय ही बँट गया था" वाला मौखिक बँटवारा चलता है। सुप्रीम कोर्ट ने विनीता शर्मा वाले फ़ैसले में कहा है कि बेटी के हक़ के ख़िलाफ़ सिर्फ़ मौखिक बँटवारे या बिना रजिस्ट्री वाले बँटवारा-ज्ञापन का दावा नहीं माना जाएगा। क़ानून में मान्य तरीका रजिस्टर्ड बँटवारा-पत्र या कोर्ट की डिक्री है; मौखिक बँटवारा सिर्फ़ ख़ास मामलों में माना जा सकता है, जब पुराने सरकारी दस्तावेज़ उसे साबित करें। सीधी बात: जो बँटवारा हो चुका है, उसे भी अब रजिस्टर्ड कागज़ पर ले आइए।
बिहार में बँटवारे की रजिस्ट्री का ख़र्च कितना है?
निबंधन विभाग की स्टांप ड्यूटी और फ़ीस तालिका (पेज 6, क्रम 39, Partition Deed) के अनुसार:
| दस्तावेज़ | स्टांप ड्यूटी | निबंधन शुल्क |
|---|---|---|
| विरासत में मिली / पारिवारिक संपत्ति का बँटवारा | ₹50 | ₹50 |
| बाक़ी बँटवारे (जैसे दो दोस्तों ने मिलकर ख़रीदी ज़मीन) | अनुच्छेद 45 के तहत, बॉन्ड (अनुच्छेद 15) वाली दर से | 2%, सबसे बड़े हिस्सेदार का हिस्सा छोड़कर |
| पुश्तैनी संपत्ति का हक़त्याग (भाई/बहन, माता/पिता, पति/पत्नी आदि के बीच) | हिस्से की MVR वाली क़ीमत का 3% | ₹1,000 |
मतलब बँटवारा बहुत सस्ता है, हक़त्याग नहीं। अगर बहन को ज़मीन में हिस्सा देना है, तो बँटवारे में ही उसका टुकड़ा अलग कर देना ₹100 में हो जाता है। बाक़ी ख़र्च (डीड राइटर, स्कैनिंग आदि) और गिफ़्ट/सेटलमेंट की दरें हमारी पटना रजिस्ट्री ख़र्च गाइड में हैं। तालिका में "पारिवारिक संपत्ति" किसे माना जाएगा, यह अपने अवर निबंधन कार्यालय से पक्का कर लें।
बँटवारे के बाद हर हिस्सेदार के नाम अलग जमाबंदी कैसे बनेगी?
बँटवारा-पत्र बनने से जमाबंदी अपने-आप नहीं बदलती। हर हिस्सेदार के नाम अलग जमाबंदी के लिए दाखिल-खारिज (बँटवारा नामांतरण) कराना ज़रूरी है:
- कहाँ: biharbhumi.bihar.gov.in पर "ऑनलाइन दाखिल-खारिज", अपने ख़ुद के लॉगिन से। स्टेप-बाय-स्टेप तरीका: दाखिल-खारिज ऑनलाइन गाइड।
- कागज़: बँटवारा-पत्र/आदेश, वंशावली, पूर्वज का मृत्यु प्रमाण पत्र, और सभी हिस्सेदारों के नाम और मोबाइल नंबर।
- पहले रिकॉर्ड ठीक करें: अगर ऑनलाइन जमाबंदी में खाता, खेसरा या रकबा ग़लत है, तो पहले परिमार्जन प्लस से सुधार कराएँ। विभाग ने 2025 के राजस्व महा-अभियान में भी यही क्रम रखा था: पहले परिमार्जन, फिर बँटवारा नामांतरण।
- समय-सीमा: बँटवारे के 90 दिन के भीतर आवेदन करें; देर हो तो विलंब माफ़ी याचिका साथ लगानी होती है।
- फ़ीस और समय: दाखिल-खारिज पूरी तरह निःशुल्क है। आपत्ति न हो तो 35 कार्य दिवस, आपत्ति हो तो 75 कार्य दिवस के भीतर अंचलाधिकारी को निपटारा करना है।
दिसंबर 2025 की ख़बरों के अनुसार बिहार भूमि पर "उत्तराधिकार-सह-बँटवारा" का एक ही आवेदन शुरू किया गया है, ताकि हर वारिस को अलग-अलग दाखिल-खारिज न करना पड़े। आवेदन करते समय पोर्टल पर यह विकल्प देख लें। न दिखे, तो अपने हल्का कर्मचारी या अंचल कार्यालय से पूछें।
भाई ने बिना बँटवारे के पुश्तैनी ज़मीन बेच दी, अब क्या करें?
राजस्व विभाग के दाखिल-खारिज FAQ (प्रश्न 22) में ठीक यही सवाल है। जवाब: सिर्फ़ केवाला हो जाने से रिकॉर्ड में मालिकाना नहीं बदलता, उसके लिए दाखिल-खारिज ज़रूरी है। जब ख़रीदार दाखिल-खारिज का आवेदन करेगा, तब आप उस पर आपत्ति दर्ज करके अपना पक्ष रख सकते हैं, और आपत्ति सही पाई गई तो अंचलाधिकारी नाम नहीं बदलेंगे।
- पता कैसे चले: अपनी जमाबंदी पर SMS अलर्ट चालू करें, और बिहार भूमि पर अपने प्लॉट पर दायर दाखिल-खारिज आवेदन देखते रहें। तरीका: ज़मीन धोखाधड़ी से कैसे बचें।
- ख़रीदार के लिए क्या लगता है: FAQ (प्रश्न 6) के अनुसार अगर ज़मीन जमाबंदी रैयत के अलावा किसी और से ली गई है, तो दाखिल-खारिज में वंशावली, जमाबंदी रैयत से विक्रेता का रिश्ता साबित करने वाला कागज़, और बाक़ी हिस्सेदारों का सहमति-पत्र लगाना होता है।
- रजिस्ट्री तो हो जाएगी: सुप्रीम कोर्ट ने समीउल्लाह बनाम बिहार राज्य (7 नवंबर 2025) में बिहार निबंधन नियमावली का वह नियम (नियम 19 (xvii), (xviii)) रद्द कर दिया, जिसमें विक्रेता के नाम जमाबंदी न होने पर रजिस्ट्री रोकी जा सकती थी। यानी रजिस्ट्री होना इस बात का सबूत नहीं कि बेचने वाले का पूरा हक़ था। जाँच ख़रीदार को ख़ुद करनी है।
पटना में पुश्तैनी ज़मीन ख़रीद रहे हैं? ये 6 बातें पक्की करें
- जमाबंदी किसके नाम है? अगर दादा/पिता के नाम है, तो विक्रेता अकेला मालिक नहीं है।
- वंशावली लें और देखें कि उसमें बेटियाँ और गुज़र चुके वारिसों के बच्चे भी हैं।
- हर वारिस या तो केवाले में बेचने वाला बने, या उसका रजिस्टर्ड हक़त्याग/बँटवारा-पत्र हो। हमारी राय में सिर्फ़ नोटरी वाला "सहमति का काग़ज़" काफ़ी न मानें।
- बँटवारे में जो खेसरा विक्रेता के हिस्से आया, वही आपको बेचा जा रहा है, और नक्शे पर वही टुकड़ा है (भू-नक्शा कैसे देखें)।
- उस प्लॉट पर कोई दाखिल-खारिज आपत्ति, राजस्व न्यायालय या सिविल केस तो नहीं चल रहा।
- बेहतर तरीका: पहले परिवार बँटवारा और विक्रेता के नाम अलग जमाबंदी कराए, फिर केवाला। थोड़ा समय लगेगा, पर बाद का झगड़ा नहीं होगा।
बाक़ी कागज़ों की पूरी सूची: पटना में प्लॉट ख़रीदने से पहले पूरी गाइड।
बँटवारे पर परिवार में सहमति न बने तो कहाँ जाएँ?
| रास्ता | कब |
|---|---|
| DCLR (भूमि सुधार उप समाहर्ता) के पास, बिहार भूमि विवाद निराकरण अधिनियम, 2009 के तहत | धारा 4 में "भू-खंड का विभाजन", सीमा-विवाद और रिकॉर्ड की प्रविष्टि में सुधार जैसे मामले शामिल हैं। वाद बिहार भूमि के "ऑनलाइन राजस्व न्यायालय" से भी दायर होता है। DCLR के आदेश के ख़िलाफ़ 30 दिन में आयुक्त के पास अपील। |
| सिविल कोर्ट में बँटवारे का मुक़दमा | जब हिस्से पर ही विवाद हो (कौन वारिस है, ज़मीन पुश्तैनी है या नहीं, कोई वसीयत है)। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार प्रारंभिक डिक्री सिर्फ़ हिस्सा तय करती है; असली बँटवारा अंतिम डिक्री से होता है। |
आपके मामले में कौन-सा रास्ता सही है, यह कागज़ देखकर कोई वकील ही बता सकता है। मुक़दमे से पहले एक बार परिवार के साथ बैठकर रजिस्टर्ड बँटवारा करने की कोशिश ज़रूर करें; ख़र्च और समय, दोनों में यही सबसे सस्ता है।
- दाखिल-खारिज से संबंधित FAQ, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, बिहार: प्रश्न 4 (ग) बँटवारे के मान्य कागज़, (घ) विरासत में मृत्यु प्रमाण पत्र और वंशावली, 90 दिन; प्रश्न 5 (विलंब माफ़ी); प्रश्न 6 (वंशावली, रिश्ते का सबूत, हिस्सेदारों का सहमति-पत्र); प्रश्न 17 (35/75 कार्य दिवस); प्रश्न 18 (निःशुल्क); प्रश्न 22 (बिना बँटवारे बिक्री पर आपत्ति) — biharbhumi.bihar.gov.in/Biharbhumi/FAQ/13.html
- विशेष सर्वेक्षण FAQ: प्रश्न 12 (गाँव में न रहने वाले वारिसों की वंशावली), प्रश्न 46 (वंशावली का सत्यापन), प्रश्न 48 (प्रपत्र 3(1)), प्रश्न 65 (बेटा, बेटी, माँ को बराबर हिस्सा; पिता Class I में नहीं) — PDF; बिहार विशेष सर्वेक्षण एवं बंदोबस्त (संशोधन) नियमावली, 2026, गजट सं. 624, 1 जून 2026: नियम 6(3) (ग्रामीण प्रपत्र 3(1), नगर क्षेत्र प्रपत्र 3(1)(A)) — PDF
- राजस्व महा-अभियान 2025 (16 अगस्त–20 सितंबर 2025): उत्तराधिकार नामांतरण और बँटवारा नामांतरण के कागज़ — biharbhumiplus.bihar.gov.in/mah
- नागरिक सुविधाओं के बारे में जानकारी, भाग-19: बिहार भूमि विवाद निराकरण अधिनियम, 2009, धारा 4 (ङ) "भू-खंड का विभाजन" — biharbhumi.bihar.gov.in/Biharbhumi/CitizenInfo.aspx
- "Table of Stamp Duty & Registration Fee", निबंधन विभाग, बिहार: पेज 6, क्रम 39 (Partition Deed; विरासत/पारिवारिक संपत्ति पर ₹50 + ₹50) — PDF
- सुप्रीम कोर्ट: Vineeta Sharma v. Rakesh Sharma, 11.08.2020, पैरा 127-129 (धारा 6, बेटी सहदायिक, मौखिक बँटवारा) · B.S. Lalitha v. Bhuvanesh, 2026 INSC 499, पैरा 61 (Class I वारिस) · Samiullah v. State of Bihar, 2025 INSC 1292, 07.11.2025, पैरा 38 (अधिसूचना IV.M-1-12/2019-3644 दिनांक 10.10.2019 रद्द) — sci.gov.in
आपको क्या करना चाहिए? (हमारी सलाह)
- बँटवारा टालिए मत। जितनी पीढ़ियाँ बीतेंगी, वारिस उतने बढ़ेंगे और सहमति उतनी मुश्किल होगी। आज 3 भाई-बहन हैं, 20 साल बाद 12 हो सकते हैं।
- रजिस्टर्ड बँटवारा कराइए। पारिवारिक संपत्ति पर कुल ₹100 सरकारी ख़र्च है; बाद के मुक़दमे से यह बहुत सस्ता है।
- बेटियों को शामिल कीजिए: या तो उनका हिस्सा बँटवारे में अलग करें, या वे अपनी मर्ज़ी से रजिस्टर्ड हक़त्याग करें। उन्हें छोड़कर किया गया बँटवारा बाद में चुनौती में आ सकता है।
- बँटवारे के 90 दिन के भीतर दाखिल-खारिज का आवेदन कीजिए, और नई जमाबंदी पर SMS अलर्ट लगाइए।
- बाहर रहते हैं (दिल्ली, बेंगलुरु, खाड़ी देश)? बँटवारे में ख़ुद मौजूद रहें या रजिस्टर्ड पावर ऑफ़ अटॉर्नी दें। तरीका: बाहर रहकर पटना में प्रॉपर्टी।
- सारे सरकारी रिकॉर्ड एक जगह: बिहार लैंड रिकॉर्ड ऑनलाइन कैसे देखें।
ज़मीन के बँटवारे से जुड़े सवाल-जवाब
- पुश्तैनी ज़मीन का बँटवारा कैसे करें?
पहले बिहार भूमि पर जमाबंदी और खतियान देखें, फिर सभी वारिसों की वंशावली बनवाएँ, हिस्से और खेसरा तय करके सभी हिस्सेदारों के दस्तख़त वाला बँटवारा-पत्र अवर निबंधन कार्यालय में रजिस्टर्ड कराएँ, और 90 दिन के भीतर बिहार भूमि पर दाखिल-खारिज का आवेदन करें, ताकि हर हिस्सेदार के नाम अलग जमाबंदी बने।
- बिहार में बँटवारे की रजिस्ट्री में कितना ख़र्च लगता है?
निबंधन विभाग की तालिका के अनुसार विरासत में मिली या पारिवारिक संपत्ति के बँटवारा-पत्र पर ₹50 स्टांप ड्यूटी और ₹50 निबंधन शुल्क लगता है। दूसरे बँटवारों पर ज़्यादा ड्यूटी लगती है (अनुच्छेद 45) और निबंधन शुल्क 2% होता है, जिसमें सबसे बड़े हिस्सेदार का हिस्सा नहीं गिना जाता। डीड राइटर और स्कैनिंग का ख़र्च अलग है।
- बिहार में वंशावली कैसे बनती है और कौन देता है?
वंशावली में जमाबंदी/खतियान वाले रैयत से आज के सभी जीवित वारिसों तक का पूरा परिवार लिखा जाता है। गाँवों में यह सरपंच से बनती है। दिसंबर 2025 की ख़बरों के अनुसार शहरी निकाय क्षेत्रों में अंचलाधिकारी को वंशावली जारी करने का अधिकार दिया गया है; पटना शहर के लिए अपने अंचल कार्यालय से पुष्टि करें। विशेष सर्वे में वंशावली प्रपत्र 3(1) में भरी जाती है; नगर निकाय क्षेत्र (जैसे पटना शहर) में प्रपत्र 3(1)(A) में।
- क्या शादीशुदा बेटी का पिता की पुश्तैनी ज़मीन में हिस्सा है?
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 (2005 संशोधन) के अनुसार बेटी जन्म से सहदायिक है और उसका हक़ बेटे जैसा है; इसमें शादी की कोई शर्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में कहा कि यह हक़ 2005 से पहले जन्मी बेटी को भी है और पिता का 2005 में जीवित होना ज़रूरी नहीं। 20 दिसंबर 2004 से पहले हो चुका बँटवारा इससे नहीं खुलता।
- क्या मौखिक या आपसी बँटवारे से दाखिल-खारिज हो सकता है?
राजस्व विभाग के FAQ के अनुसार सभी हिस्सेदारों के दस्तख़त वाला आपसी बँटवारा-पत्र या पंचायती बँटवारा, सभी की लिखित सहमति के साथ, दाखिल-खारिज के लिए माना जाता है। पर सिर्फ़ ज़ुबानी बँटवारा बाद में कोर्ट में कमज़ोर पड़ता है, इसलिए उसे रजिस्टर्ड बँटवारा-पत्र में बदल लेना बेहतर है।
- बँटवारे के बिना एक हिस्सेदार ज़मीन बेच दे तो क्या करें?
राजस्व विभाग के FAQ के अनुसार सिर्फ़ केवाले से रिकॉर्ड में मालिकाना नहीं बदलता। जब ख़रीदार दाखिल-खारिज का आवेदन करे, तब बिहार भूमि पर उस वाद पर ऑनलाइन आपत्ति दर्ज करें। आपत्ति सही पाई गई तो अंचलाधिकारी नाम नहीं बदलेंगे। केवाला रद्द कराने या हिस्से के लिए वकील से सलाह लें।
- दादा के नाम की जमाबंदी है, क्या पोता ज़मीन बेच सकता है?
नवंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट फ़ैसले के बाद सिर्फ़ इस वजह से रजिस्ट्री नहीं रुकती कि जमाबंदी विक्रेता के नाम नहीं है। पर पोता सिर्फ़ अपना हिस्सा ही बेच सकता है, और ख़रीदार के दाखिल-खारिज में वंशावली, रिश्ते का सबूत और बाक़ी हिस्सेदारों की सहमति लगेगी। सुरक्षित तरीका है: पहले बँटवारा और अलग जमाबंदी, फिर बिक्री।
यह लेख 18 अक्टूबर 2026 को राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, बिहार के दाखिल-खारिज FAQ, विशेष सर्वेक्षण FAQ, नागरिक सुविधा सूचनाओं और राजस्व महा-अभियान पेज, निबंधन विभाग की स्टांप-फ़ीस तालिका, और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर आधारित है। वंशावली जारी करने और "उत्तराधिकार-सह-बँटवारा" आवेदन वाली जानकारी ख़बरों पर आधारित है; इसकी पुष्टि अंचल कार्यालय से करें। यह सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। हिस्सा तय करने, बँटवारा-पत्र बनवाने या किसी विवाद में अपने कागज़ लेकर किसी वकील से सलाह लें।