Bayana Lete Samay Savdhani: पटना में ज़मीन बेचने वाले की गाइड
सीधा जवाब: पटना में ज़मीन या मकान का बयाना (टोकन या एडवांस) सिर्फ़ बैंक से, ख़रीदार के अपने खाते से लें। आयकर अधिनियम 2025 के अनुसार प्रॉपर्टी सौदे का ₹20,000 या ज़्यादा एडवांस नकद लेना मना है, और उतनी ही रकम का जुर्माना आप पर लगता है। सभी हिस्सेदारों के साथ लिखित इकरारनामा करें, जिसमें दाम, भुगतान की तारीख़ें, रजिस्ट्री की आख़िरी तारीख़ और कोई पीछे हटे तो बयाने का क्या होगा, यह लिखा हो। पूरी मज़बूती चाहिए तो इसकी रजिस्ट्री कराएँ (2% + ₹1,000), और इस पर कब्ज़ा दे रहे हैं तो रजिस्ट्री ज़रूरी है। पूरा दाम खाते में आने तक कब्ज़ा और असली कागज़ अपने पास रखें।
पटना में ज़मीन के ज़्यादातर सौदे बयाने पर ही या तो पक्के होते हैं, या बिगड़ने लगते हैं। ख़रीदार के लिए पैसा डूबने का डर होता है; विक्रेता के लिए डर यह कि कोई ख़रीदार महीनों तक ज़मीन "रोककर" बैठा रहे और सौदा पूरा न करे, या झगड़ा हो कि पीछे कौन हटा। सही तरीके से बयाना लेना आपको दोनों से बचाता है।
बयाना कभी नकद न लें: ₹20,000 का नियम
आयकर अधिनियम 2025 की धारा 185 के अनुसार कोई भी व्यक्ति "specified sum" ₹20,000 या ज़्यादा (उसी व्यक्ति से पहले की बकाया रकम मिलाकर) अकाउंट-पेयी चेक, अकाउंट-पेयी ड्राफ़्ट या बैंक ट्रांसफ़र के अलावा नहीं ले सकता। धारा 189(c) में "specified sum" का मतलब है अचल संपत्ति के अंतरण से जुड़ा एडवांस या कोई भी रकम, चाहे अंतरण हो या न हो।
- जुर्माना: धारा 450 में ली गई रकम के बराबर। ₹2 लाख नकद बयाने पर ₹2 लाख जुर्माना।
- किस पर: पैसा लेने वाले पर, यानी विक्रेता पर।
- वापसी भी: बयाना लौटाना पड़े तो ₹20,000 या ज़्यादा की वापसी भी चेक, ड्राफ़्ट या बैंक ट्रांसफ़र से ही होगी (धारा 188)।
पैसा ख़रीदार के अपने खाते से (किसी दोस्त या ब्रोकर के खाते से नहीं) अपने खाते में लें, और UTR या चेक नंबर इकरारनामे में लिखें।
विक्रेता को कितना बयाना लेना चाहिए?
कानून में कोई तय रकम नहीं है। सलाहकार के तौर पर हमारी राय: इतना कि ख़रीदार की गंभीरता दिखे, और साथ में रजिस्ट्री की छोटी, तय तारीख़ हो। बिना तारीख़ का बड़ा एडवांस बस आपकी ज़मीन रोके रखता है, जबकि ख़रीदार पैसे का इंतज़ाम करता रहता है। ईमानदार विक्रेता के लिए छोटा बयाना, 30-60 दिन में रजिस्ट्री की तारीख़, और तारीख़ निकलने पर क्या होगा इसकी साफ़ शर्त, ज़्यादा अच्छा काम करती है।
बयाने के इकरारनामे में क्या-क्या लिखें?
| शर्त | विक्रेता के लिए क्यों ज़रूरी |
|---|---|
| सभी विक्रेताओं के नाम और दस्तख़त, हर हिस्सेदार समेत | संयुक्त ज़मीन पर एक भाई के दस्तख़त से सौदा नहीं, झगड़ा बनता है |
| ज़मीन: मौज़ा, थाना नं., खाता, खेसरा, कट्ठा-धुर और डिसमिल में रकबा, चौहद्दी, जमाबंदी नंबर | केवाले में ठीक यही जाएगा; बाद में "कौन सा प्लॉट" वाली बहस नहीं |
| कुल दाम, मिला बयाना (UTR के साथ), बाकी रकम और उसकी तारीख़ | क्या मिला और क्या बाकी है, इसका सबूत |
| रजिस्ट्री की आख़िरी तारीख़ | ख़रीदार तब तक पैसा न दे तो आप आज़ाद |
| स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्री फ़ीस और केवाले का खर्च कौन देगा | रजिस्ट्री के दिन झगड़ा नहीं (पटना में आम तौर पर ख़रीदार) |
| ख़रीदार चूके तो बयाने का कितना हिस्सा रखा जाएगा | उचित रकम लिखें; गोलमोल शब्दों को लागू कराना मुश्किल होता है |
| विक्रेता चूके (जैसे बताई न गई कागज़ी कमी) तो वापसी | इंसाफ़ भी, और ख़रीदार भी आसानी से दस्तख़त करता है |
| कब्ज़ा सिर्फ़ पूरे भुगतान / रजिस्ट्री पर | सिर्फ़ बयाने पर कभी कब्ज़ा न दें |
| ₹50 लाख या ज़्यादा का सौदा हो तो 1% TDS; दोनों का PAN | ताकि आपका TDS क्रेडिट न छूटे |
| आपको जो पता है वह खुलकर लिखें: अधूरा दाखिल-खारिज, हिस्सेदार का मामला, रास्ते की बात | पता हो ऐसी बड़ी कमी बताना विक्रेता का कर्तव्य है (संपत्ति अंतरण अधिनियम, धारा 55(1)(a)); लिख देने से बाद में आप सुरक्षित रहते हैं |
क्या बिहार में इकरारनामे की रजिस्ट्री करानी चाहिए?
- खर्च: निबंधन विभाग की तालिका में अचल संपत्ति की बिक्री के इकरारनामे पर 2% स्टांप ड्यूटी और ₹1,000 रजिस्ट्री फ़ीस है। निबंधन कार्यालय से पूछें कि केवाले की रजिस्ट्री के समय यह ड्यूटी कैसे गिनी जाएगी।
- कब ज़रूरी है: रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1908 की धारा 17(1A) के अनुसार जिस इकरारनामे पर ख़रीदार आंशिक पालन में (संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 53A) कब्ज़ा लेता या रखता है, उसकी रजिस्ट्री ज़रूरी है, नहीं तो वह सुरक्षा नहीं मिलती।
- बिना रजिस्ट्री वाला इकरारनामा भी सबूत है, विशिष्ट पालन (specific performance) के मुक़दमे में अनुबंध के सबूत के तौर पर (धारा 49 का परंतुक), पर रजिस्टर्ड इकरारनामा कहीं ज़्यादा मज़बूत होता है और Encumbrance Certificate में भी दिखता है।
बिना कब्ज़े वाले छोटे, जल्दी पूरे होने वाले सौदे में बहुत से विक्रेता लिखित, स्टांप वाला, दस्तख़त किया इकरारनामा करते हैं और कुछ हफ़्तों में सीधे केवाला करा लेते हैं। बड़े सौदे, रजिस्ट्री में लंबे अंतर या कब्ज़े वाली स्थिति में रजिस्ट्री कराएँ।
ख़रीदार पीछे हट जाए: क्या बयाना रख सकते हैं?
यह आपके इकरारनामे पर निर्भर है। अगर उसमें साफ़ लिखा है कि ख़रीदार तारीख़ तक पैसा न दे तो बताई गई बयाने की रकम रखी जाएगी, तो उचित रकम के लिए विक्रेता आम तौर पर मज़बूत स्थिति में है। बिना ज़ब्ती की शर्त के, गोलमोल लिखा बड़ा "एडवांस" लौटाना भी पड़ सकता है। शर्त शुरू में ही साफ़ लिखें; झगड़ा हो तो फ़ैसला करने से पहले कानूनी सलाह लें।
टैक्स: सौदा न होने पर बातचीत के दौरान मिला एडवांस ज़ब्त हो जाए, तो वह उस साल "अन्य स्रोतों से आय" में टैक्स होता है (आयकर अधिनियम 2025, धारा 92(2)(h))। इसे अपने रिटर्न में दिखाएँ। फिर आख़िर में बेचते समय यह आपकी लागत से नहीं घटता (धारा 81)।
अपने टैक्स के लिए आज का MVR पक्का करें
बिहार में MVR अब हर वित्त वर्ष 5% बढ़ता है। आयकर अधिनियम 2025 की धारा 78(1)(a) के अनुसार अगर दाम इकरारनामे में तय है और उस तारीख़ तक कुछ पैसा बैंक से मिल गया, तो आपके कैपिटल गेन के लिए रजिस्ट्री की तारीख़ की जगह इकरारनामे की तारीख़ का स्टांप ड्यूटी मूल्य माना जा सकता है। नकद बयाने पर यह फ़ायदा नहीं मिलता। दाम पर और जानकारी: MVR से सही दाम।
बयाने के समय ख़रीदार की ओर से ख़तरे के संकेत
- किसी और के खाते से, या "टैक्स बचाने" के लिए नकद देना चाहता है।
- बयाने पर ही कब्ज़ा, चाबी या निर्माण की इजाज़त माँगता है।
- बयाने के समय आपके असली केवाले माँगता है। फ़ोटोकॉपी दें; असली कागज़ पूरा पैसा मिलने के बाद ख़रीदार को जाते हैं (संपत्ति अंतरण अधिनियम, धारा 55(3))।
- केवाले की जगह "पावर ऑफ़ अटॉर्नी से बिक्री" का सुझाव देता है। सुप्रीम कोर्ट (सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज़ बनाम हरियाणा राज्य, 2011) ने कहा है कि GPA, इकरारनामा और वसीयत से की गई "बिक्री" से मालिकाना हक़ नहीं बदलता। कागज़ पर आप ही मालिक रहते हैं और ज़िम्मेदारी भी आपकी रहती है।
- ख़ाली कागज़ों पर या बिना पढ़े ड्राफ़्ट पर दस्तख़त करवाना चाहता है।
- आयकर अधिनियम, 2025, भारत का राजपत्र (असाधारण) भाग II खंड 1, 21 अगस्त 2025: धारा 185 (₹20,000 या ज़्यादा की specified sum सिर्फ़ अकाउंट-पेयी चेक/ड्राफ़्ट/बैंक से), धारा 188 (specified advance की वापसी), धारा 189(c)-(d) ("specified sum", "specified advance", अंतरण हो या न हो), धारा 450 (रकम के बराबर जुर्माना), धारा 78(1)(a) (इकरारनामे की तारीख़ का स्टांप ड्यूटी मूल्य), धारा 81 और 92(2)(h) (ज़ब्त एडवांस), धारा 393(1) तालिका क्रम 3(i) (1% TDS) — PDF
- "Table of Stamp Duty & Registration Fee", मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग, बिहार: पृष्ठ 1, क्रम 5(b), अन्य अचल संपत्ति की बिक्री से जुड़ा इकरारनामा: 2%, रजिस्ट्री फ़ीस ₹1,000 — PDF
- रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1908: धारा 17(1A) (आंशिक पालन वाले इकरारनामे), धारा 49 का परंतुक
- संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882: धारा 53A (आंशिक पालन), धारा 55(1)(a) और 55(3)
- सुप्रीम कोर्ट, सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज़ प्रा. लि. बनाम हरियाणा राज्य, 2011 (GPA/इकरारनामा/वसीयत से बिक्री में मालिकाना हक़ नहीं बदलता)
- सभी स्रोत 22.10.2026 को जाँचे गए।
आपको क्या करना चाहिए? (हमारी सलाह)
- पहले कागज़, फिर बयाना। किसी का पैसा लेने से पहले जमाबंदी ठीक करें: ज़मीन के कागज़ ठीक करें।
- सिर्फ़ बैंक से, ख़रीदार के अपने खाते से, UTR इकरारनामे में।
- हर हिस्सेदार के दस्तख़त वाला लिखित इकरारनामा, रजिस्ट्री की तारीख़ और ज़ब्ती/वापसी की साफ़ शर्त के साथ।
- रजिस्ट्री कराएँ अगर सौदा बड़ा है, समय लंबा है, या कब्ज़े की बात है।
- पूरा दाम खाते में आने तक न कब्ज़ा, न असली कागज़। बिक्री की पूरी प्रक्रिया: पटना में ज़मीन कैसे बेचें।
ज़मीन बेचते समय बयाना: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- क्या विक्रेता बयाना नकद ले सकता है?
₹20,000 या ज़्यादा नहीं। आयकर अधिनियम 2025 की धारा 185 अचल संपत्ति के अंतरण से जुड़ा ₹20,000 या ज़्यादा एडवांस अकाउंट-पेयी चेक, ड्राफ़्ट या बैंक ट्रांसफ़र के अलावा लेने पर रोक लगाती है, चाहे बिक्री आख़िर में हो या न हो। धारा 450 में जुर्माना उतनी ही रकम का है।
- क्या बिना रजिस्ट्री का बयाना इकरारनामा मान्य है?
हाँ, अनुबंध के तौर पर, और विशिष्ट पालन के मुक़दमे में सबूत के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है। पर अगर इस पर कब्ज़ा दिया गया है, तो रजिस्ट्रेशन अधिनियम की धारा 17(1A) में इसकी रजिस्ट्री ज़रूरी है। बिहार में बिक्री इकरारनामे की रजिस्ट्री का खर्च 2% स्टांप ड्यूटी और ₹1,000 फ़ीस है।
- ख़रीदार पीछे हट जाए तो क्या टोकन मनी रख सकते हैं?
अगर इकरारनामे में साफ़ लिखा है कि ख़रीदार तारीख़ तक पैसा न दे तो बताई गई बयाने की रकम रखी जाएगी, तो उचित रकम के लिए आम तौर पर हाँ। ऐसी शर्त न हो, या एडवांस बड़ा हो, तो लौटाना पड़ सकता है। ज़ब्त एडवांस "अन्य स्रोतों से आय" के तौर पर टैक्स होता है।
- पटना में ज़मीन का कितना बयाना आम है?
कानून में कोई नियम नहीं है। सलाहकार के तौर पर हम ऐसी रकम सुझाते हैं जिससे ख़रीदार की गंभीरता दिखे, और साथ में रजिस्ट्री की छोटी तारीख़ (30-60 दिन) हो, बजाय बिना तारीख़ के बड़े एडवांस के।
- क्या बयाना लेकर कब्ज़ा दे देना चाहिए?
नहीं। कब्ज़ा रजिस्ट्री के दिन, पूरा दाम मिलने के बाद दें। इकरारनामे पर कब्ज़ा देने से ख़रीदार को संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 53A की सुरक्षा मिल जाती है (इकरारनामा रजिस्टर्ड हो तो), इसलिए अगर ख़रीदार फिर पैसा न दे तो ज़मीन वापस लेना धीमा और मुश्किल होता है।
- क्या इकरारनामे की तारीख़ मेरे टैक्स के लिए मायने रखती है?
हाँ। अगर उस तारीख़ तक दाम का कुछ हिस्सा बैंक से मिल गया, तो धारा 78(1)(a) में आपके कैपिटल गेन के लिए उसी तारीख़ का स्टांप ड्यूटी मूल्य माना जा सकता है, जो हर अप्रैल MVR बढ़ने पर काम आता है।
यह लेख 22 अक्टूबर 2026 को आयकर अधिनियम 2025, रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1908, संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 और बिहार निबंधन विभाग की स्टांप ड्यूटी तालिका के आधार पर लिखा गया है। बयाना रखा जा सकता है या नहीं, यह तथ्यों और इकरारनामे पर निर्भर है; झगड़े में कानूनी सलाह लें। यह सामान्य जानकारी है, कानूनी या टैक्स सलाह नहीं।